राजाराम मोहन राय को भारतीय पुनर्जागरण का जनक माना जाता है. उनके द्वारा स्थापित ब्रह्म समाज हिन्दू धर्म का पहला सुधार आंदोलन था. राजाराम मोहन राय प्राच्य और पाश्चात्य चिंतन के मिले-जुले रुप के प्रतिनिधि थे. इन्हें भारतीय पत्रकारिता का जनक भी कहा जाता है. हिन्दू धर्म का शुद्धिकरण इनका मुख्य उद्देश्य था. इनसे जुड़े परीक्षोपयोगी महत्वपूर्ण तथ्यों का क्रमवार अध्ययन नीचे दिया गया है.
जन्म – 22 मई 1772 को बंगाल के एक ब्राम्हण परिवार में
शिक्षा – वाराणसी (संस्कृत साहित्य व हिन्दू दर्शन) और पटना (कुरान और फारसी तथा अरबी साहित्य)
नौकरी – 1803 – 1814 तक ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए
भाषाओं का ज्ञान – संस्कृत, अरबी, फारसी, अंग्रेजी, फ्रेंच, लैटिन, ग्रीक और हिब्रू सहित एक दर्जन से अधिक
1809 – फारसी भाषा में ”एकेश्वरवादियों को उपहार” नामक पुस्तक की रचना (एकेश्वरवाद में विश्वास प्रकट किया )
1814 – कलकत्ता में ”आत्मीय सभा’‘ की स्थापना
1817 – डेविड हेयर को कलकत्ता में हिन्दू कॉलेज की स्थापना में मदद
1818 – अपनी भाभी के सती होने पर सती विरोधी अभियान शुरू किया
1820 – प्रीसेप्ट्स ऑफ जीसस नामक पुस्तक लिखी। (न्यू टेस्टामेंट के नैतिक एवं दार्शनिक सन्देश को चमत्कारिक कहानियों से अलग करना का प्रयास)
1825 – वेदांत कॉलेज की स्थापना
अगस्त 1828 – ब्रह्म सभा की स्थापना (बाद में ब्रह्म समाज कहलाया)
1829 – लार्ड विलियम बेंटिक के सहयोग से सती प्रथा को गैर क़ानूनी घोषित करवाया
1830 – राजा राधाकांत देव ने ब्रह्म समाज के सिद्धांतों का विरोध करने हेतु ‘धर्म सभा‘ का गठन किया।
27 सितम्बर 1933 – ब्रिस्टल (लन्दन) में मृत्यु
ब्रह्म समाज का योगदान – समर्थन और विश्वास
एकेश्वरवाद में विश्वास – ईश्वर एक है तथा वह सभी सद्गुणों का केंद्र है.
निर्गुण ब्रह्म की उपासना – ईश्वर निर्गुण और निराकार है. वह न कभी जन्म लेता है न कभी मरता है.
सर्वधर्म समभाव पर बल – उनके अनुसार सभी धर्मों में सत्य निहित है. अतः मनुष्य को सभी धर्मों का आदर करना चाहिए।
नैतिकता और कर्मफल में विश्वास
विधवा विवाह और स्त्री शिक्षा का समर्थन
बांग्ला एवं अंग्रेजी शिक्षा के प्रचार- प्रसार को समर्थन
अन्तराष्ट्रीयता और विभिन्न राष्ट्रों के मध्य परस्पर सहयोग में विश्वास
विरोध और प्रहार
बहुदेववाद में अविश्वास
मूर्तिपूजा का विरोध – चूँकि ईश्वर सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान, जगत का पालनकर्ता और अमर है, इसलिए मूर्तिपूजा नहीं की जानी चाहिए . ब्रम्ह समाज के किसी भी भवन के अंदर किसी मूर्ति, चित्र या पेंटिंग की पूजा की अनुमति नहीं थी.
धार्मिक पुस्तकों की सर्वोच्चता में अविश्वास – वे धार्मिक पुस्तकों के अध्ययन या पूजा में भी विश्वास नहीं रखते थे, क्योंकि कोई भी पुस्तक त्रुटिरहित नहीं हो सकती।
बहुपत्नी प्रथा एवं सती प्रथा, पर्दा प्रथा एवं बाल विवाह का विरोध
छुआछूत, अन्धविश्वास, जातिगत भेदभाव का विरोध
हिन्दुओं द्वारा विदेश यात्रा को धर्म विरुद्ध घोषित किये जाने की आलोचना
बंगाल के जमींदारों के उत्पीड़न की निंदा
राजा राम मोहन राय की मृत्यु के बाद ब्रह्म समाज
राजाराम मोहन राय के लन्दन जाने के बाद ब्रह्म समाज का संचालन रामचंद्र विद्या वागीश द्वारा किया गया.
1843 में देवेन्द्रनाथ टैगोर ब्रह्म समाज में शामिल हुए तथा इसे पुनर्जीवित किया।
देवेन्द्रनाथ टैगोर ब्रह्म समाज में शामिल होने से पहले ज्ञानवर्धिनी एवं तत्वबोधिनी सभा जुड़े थे.
1839 में गठित तत्वबोधिनी सभा, बंगाली भाषा में ”तत्वबोधिनी पत्रिका” का प्रकाशन करती थी.
बाद में ईश्वरचंद्र विद्यासागर और अश्विनी कुमार दत्त जैसे महान विचारक भी ब्रह्म समाज से जुड़े।
ग़ौरतलब है कि ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने अनुचित सरकारी हस्तक्षेप के कारण सरकारी सेवा से त्यागपत्र दे दिया था.
1843 में ही देवेन्द्रनाथ टैगोर का ईसाई धर्म के समर्थक अलेक्जेंडर डफ से वाद-विवाद आरभ हो गया.
1857 में केशव चंद्र सेन ने ब्रह्म समाज की सदस्यता ग्रहण की. देवेन्द्रनाथ टैगोर ने उन्हें समाज का आचार्य नियुक्त किया।
देवेन्द्रनाथ टैगोर से मतभेद होने के कारण 1865 में केशवचन्द्र सेन को आचार्य की पदवी से बर्खास्त कर दिया गया.
1866 में सेन ने ‘भारतीय ब्रह्म समाज’ के नाम से नयी सभा गठित की. इस प्रकार ब्रह्म समाज का पहला विभाजन.
विभाजन के बाद देवेन्द्रनाथ टैगोर के ब्रह्म समाज को ‘आदि ब्रह्म समाज‘ के नाम से जाना जाने लगा.
1878 में केशवचन्द्र सेन द्वारा अपनी नाबालिग पुत्री का विवाह कूच विहार के राजा से करने के कारण ‘भारतीय ब्रह्म समाज’ का दूसरा विभाजन.
सेन ने अलग होकर नए समाज ‘साधारण ब्रह्म समाज’ की स्थापना की.
राजाराम मोहन राय द्वारा सरकार से की गयी मांग
स्त्रियों को संपत्ति का अधिकार दिए जाने की मांग
बंगाल के रैयतों द्वारा दिए जा रहे लगान की अधिकतम मात्रा निर्धारित करने की मांग
निर्यात की जाने वाली वस्तुओं पर प्रशुल्क घटाने की मांग
ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक विशेषाधिकारों को समाप्त करने की मांग
उच्च सेवाओं के भारतीयकरण की मांग
कार्यपालिका को न्यायपालिका से पृथक किये जाने की मांग
न्यायिक समानता की मांग
राजाराम मोहन राय द्वारा प्रकाशित समाचार पत्र
1. संवाद कौमुदी – 1921 में प्रकाशित, बांग्ला भाषा में प्रकाशित (भारतियों द्वारा सम्पादित, प्रकाशित व संचालित प्रथम समाचार पत्र)
2. मिरातुल अख़बार – 1922 में प्रकाशित, फारसी भाषा में प्रकाशित
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