भाषा परीक्षण (अभ्यास प्रश्नावली)
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अनुच्छेद 7 (अपठित गद्यांश)

दिए गए गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़ें और दिए गए पांच प्रश्नों के उत्तर दें। आर्यभट्ट पांचवीं शताब्दी के महान गणितज्ञ तथा भौतिकी के ज्ञाता थे। 23 वर्ष की उम्र में ही उन्होंने प्रसिद्ध पुस्तक आर्यभट्टीयम की रचना की। उन्होंने बताया कि शून्य एक संख्या मात्र नहीं है, यह एक अवधारणा है। शून्य के आविष्कार से ही आर्यभट्ट सूर्य और चन्द्रमा के बीच की दूरी का सही-सही मापन कर पाए। शून्य की खोज से ही ऋणात्मक संख्याओं की एक नई दिशा का द्वार भी खुल गया। आर्यभट्ट ने विज्ञान के क्षेत्र में, विशेषकर नक्षत्र विज्ञान के क्षेत्र में बहुत ही सराहनीय योगदान दिया। प्राचीन भारत में नक्षत्र विज्ञान, जिसे खगोलशास्त्र कहते हैं, बहुत ही उन्नत अवस्था में था। नक्षत्र विज्ञान का ज्ञान, विशेष रुप से नक्षत्रों और ज्वार-भाटा का ज्ञान, व्यापारियों के लिए बहुत ही जरुरी था। क्योंकि रात के समय समुद्र और रेगिस्तान को पार करने में यह बहुत ही मददगार था। वर्षा, कृषि, त्योहारों और ऋतुओं की जानकारी में भी नक्षत्र विज्ञान ने बहुत ही मदद की। आर्यभट्ट ने पृथ्वी एक अचल ग्रह है, के सिद्धांत को नकारकर अपना प्रसिद्ध सिद्धांत दिया कि पृथ्वी गोल है और अपनी धुरी पर घूमती है। चन्द्रमा और अन्य ग्रह सूर्य की रोशनी के कारण ही चमकते हैं। उनके इतने सारे योगदान के कारण ही देश के प्रथम उपग्रह का नाम आर्यभट्ट रखा गया।